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MPPSC State Service Syllabus-Topic Workbook (Hindi–English)

हिंदी-अंग्रेज़ी द्विभाषीHindi + English

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223 pages
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Exam focus
MPPSC
Language
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अध्याय 1: परीक्षा का ढाँचा, द्विभाषी प्रश्नपत्र पद्धति और स्कोरिंग रणनीति

अध्याय 1: परीक्षा का ढाँचा, द्विभाषी प्रश्नपत्र पद्धति और स्कोरिंग रणनीति — पुस्तक की भाषा-नीति और परीक्षा-नक्शा एक साथ स्थापित करें।

KarmSakha preparation topics covered

  • समझें और लागू करें: परीक्षा-नक्शा: प्रारंभिक और मुख्य का समग्र ढाँचा
  • समझें और लागू करें: प्रारंभिक परीक्षा: सामान्य अध्ययन और अर्हकारी GAT
  • समझें और लागू करें: मुख्य परीक्षा: वर्णनात्मक GS प्रश्नपत्र और भाग-विभाजन
  • समझें और लागू करें: आधिकारिक अधिसूचना का अधिकार और निर्देश-पृष्ठ का नियम
  • समझें और लागू करें: स्कोरिंग गणित: ऋणात्मक अंकन का सूत्र
  • समझें और लागू करें: लाभ-हानि-संतुलन शुद्धता (Break-even Accuracy)
  • समझें और लागू करें: अर्हकारी प्रश्नपत्र में शुद्धता का महत्व
  • समझें और लागू करें: द्विभाषी प्रश्नपत्र पद्धति और पारिभाषिक युग्म
  • समझें और लागू करें: तीन-चक्र अटेम्प्ट क्रम, समय-बजट और छोड़ो-नियम

परीक्षा-नक्शा: प्रारंभिक और मुख्य का समग्र ढाँचा

परीक्षा-नक्शा किसी शहर के नक्शे की तरह है: जब तक आपको पता नहीं कि कौन-सा मार्ग किस चरण को जोड़ता है, पाठ्य-पुस्तक का हर पृष्ठ एक मोड़ की तरह लगता है। मध्यप्रदेश राज्य सेवा परीक्षा की प्रक्रिया तीन बड़े चरणों में चलती है—प्रारंभिक परीक्षा (Preliminary Examination), मुख्य परीक्षा (Main Examination) और साक्षात्कार (Interview/Viva-Voce)। प्रारंभिक परीक्षा दो वस्तुनिष्ठ प्रश्नपत्रों की होती है। इनमें से पहला सामान्य अध्ययन है और दूसरा सामान्य अभिरुचि परीक्षण। मुख्य परीक्षा वर्णनात्मक प्रश्नपत्रों पर आधारित होती है और उसके सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र हर बार भाग-अ और भाग-ब में विभाजित रहते हैं। ये दो प्रश्नपत्र-संरचनाएँ ही पूरी तैयारी का कंकाल हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के दोनों प्रश्नपत्रों का स्वरूप बहुविकल्पीय (objective/MCQ) है। परीक्षा का नाम चाहे 'राज्य सेवा' हो, इसका दायरा मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है; सामान्य अध्ययन में राज्य का इतिहास, अर्थव्यवस्था, भूगोल, प्रशासनिक संरचना और समसामयिकी के साथ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ भी आती हैं। सामान्य अभिरुचि परीक्षण में पारंपरिक ज्ञान के बजाय तर्क, गणितीय समझ और अभिवृत्ति की परख होती है। दोनों पत्रों की अपनी अलग भूमिका है: एक मेरिट के लिए, दूसरा योग्यता की न्यूनतम दहलीज के लिए।

मुख्य परीक्षा का स्वरूप पूर्णतः वर्णनात्मक होता है। यहाँ परीक्षक आपकी पहचान नहीं, आपकी अभिव्यक्ति, तर्क-संगठन और सीमित शब्दों में अधिकतम सूचना देने की क्षमता देखता है। मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्रों में हर प्रश्नपत्र भाग-अ और भाग-ब में बँटा होता है। इस भाग-विभाजन का यह अर्थ नहीं है कि एक भाग कठिन और दूसरा आसान है; यह प्रश्नों को इकाइयों में क्रमबद्ध करने का तरीका है, जिससे उत्तर-पुस्तिका में उत्तर लिखते समय अंक-वितरण स्पष्ट रहे। भाग-विभाजन से अभ्यर्थी को यह भी संकेत मिलता है कि किस प्रश्न का कितना प्रयास अपेक्षित है।

भाग-अ और भाग-ब की यह संरचना उत्तर-लेखन की रणनीति को भी प्रभावित करती है। जो प्रश्न भाग-अ में आते हैं, उनमें अक्सर संक्षिप्त परन्तु बहुआयामी उत्तर अपेक्षित होते हैं; भाग-ब में प्रश्नों को चुनने और व्यवस्थित करने की स्वतंत्रता जैसे नियम भी हो सकते हैं। पर इनमें से कोई भी बात स्थायी नहीं है। अधिसूचना के साथ दिए गए प्रश्नपत्र-प्रारूप या आयोग की परीक्षा-योजना तालिका को देखकर ही तय करें कि किस भाग में अनिवार्य प्रश्न हैं और किसमें विकल्प। यही ढाँचागत सतर्कता आपको परीक्षा-कक्ष में दिशा-भ्रम से बचाती है।

साक्षात्कार चरण को बहुत से अभ्यर्थी तैयारी के बाहर मान लेते हैं, पर परीक्षा-नक्शे में वह अंतिम चरण है। प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाएँ लिखित मापदंड हैं, जबकि साक्षात्कार में व्यक्तित्व, स्पष्टता, संयम और सामान्य ज्ञान का मौखिक उपयोग देखा जाता है। अंतिम चयन में मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों का जोड़ व्यवहार में आता है, किंतु इसका सटीक भारांक और नियम आयोग की अधिसूचना में दिया जाता है। इसलिए दीर्घकालिक रणनीति में साक्षात्कार को 'बाद में देखेंगे' के कोने में नहीं रखना चाहिए, बल्कि आरंभ से ही विचारों को सुसंगत बोलने का अभ्यास रखना चाहिए।

यहाँ एक स्थायी नियम है: इस अध्याय में दी गई कोई भी संख्या—प्रश्न-संख्या, कुल अंक, समय अवधि, अर्हकारी प्रतिशत या ऋणात्मक अंकन का अंश—पुस्तक से रटने के बजाय आयोग की नवीनतम अधिसूचना से मिलान करके देखनी चाहिए। MPPSC की अधिसूचना प्रत्येक विज्ञापन में परीक्षा-योजना की तालिका देती है। उस तालिका की संख्याएँ वर्ष-दर-वर्ष बदल सकती हैं। अभ्यर्थी का सबसे बड़ा संकट एक पुरानी पुस्तक की संख्या को नई परीक्षा पर थोप देना है। इस पुस्तक का अध्याय-नक्शा इसीलिए सरल रखा गया है: ढाँचा स्थायी है, आँकड़े अधिसूचना से हैं।

पुस्तक का अध्याय-नक्शा भी इसी परीक्षा-नक्शे के साथ चलता है। पहले प्रारंभिक परीक्षा का सामान्य अध्ययन पाठ्यक्रम रखा गया है, उसके बाद सामान्य अभिरुचि परीक्षण के उपखंड, फिर मुख्य परीक्षा के वर्णनात्मक सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र। जब भी आप इस पुस्तक का कोई अध्याय खोलें, अपने मन में यह तय करें कि यह विषय परीक्षा के किस चरण को मजबूत करता है—प्रारंभिक की वस्तुनिष्ठ सटीकता को, या मुख्य की उत्तर-लेखन को। यह निरंतर जुड़ाव ही स्कोरिंग रणनीति की नींव है।

कुल मिलाकर परीक्षा-नक्शा तीन प्रश्नों का उत्तर देता है: क्या पढ़ना है, किस क्रम में पढ़ना है, और हर चरण में उत्तर देने की शैली क्या होगी। वस्तुनिष्ठ प्रश्नपत्र में सही विकल्प चुनने की गति, वर्णनात्मक प्रश्नपत्र में उत्तर को संरचना देने की गहराई, और साक्षात्कार में संयत मौखिक अभिव्यक्ति—तीनों अलग-अलग कौशल हैं। एक ही शैली से तीनों को हल करने की कोशिश सबसे बड़ी गलती है। इसीलिए यह अध्याय पहले ढाँचा स्थापित करता है, ताकि आगे के अध्यायों में पढ़ा गया कोई भी तथ्य आपके दिमाग में बिना किसी चरण-संदर्भ के अधूरा न रहे।

प्रारंभिक परीक्षा: सामान्य अध्ययन और अर्हकारी GAT

प्रारंभिक परीक्षा का उद्देश्य एक बड़ी संख्या को छानकर मुख्य परीक्षा के लिए प्रबंधनीय संख्या में लाना है। इसमें दो वस्तुनिष्ठ प्रश्नपत्र होते हैं—प्रश्नपत्र-1 सामान्य अध्ययन (General Studies) तथा प्रश्नपत्र-2 सामान्य अभिरुचि परीक्षण (General Aptitude Test)। दोनों प्रश्नपत्रों में बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं, पर दोनों की प्रकृति एक नहीं है। पहला ज्ञान-भार मापता है, दूसरा अनुप्रयोग-क्षमता मापता है। यही एक पंक्ति पूरी प्रारंभिक रणनीति की कुंजी है—ज्ञान परिशुद्धता के लिए पढ़ा जाता है, अभिरुचि अभ्यास के लिए समझी जाती है।

प्रश्नपत्र-1 का विषय-क्षेत्र व्यापक है: मध्यप्रदेश का इतिहास, कला-संस्कृति और भूगोल; भारत का इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन; भारतीय राजनीति, शासन और संविधान; आर्थिक संरचना, योजना, बजट और समसामयिक अर्थव्यवस्था; सामान्य विज्ञान, पर्यावरण, तकनीकी विकास; तथा दैनिक समसामयिकी। इन सबमें एक विशेषता स्थायी है—मध्यप्रदेश से जुड़े तथ्यों का भार अधिक रहता है। प्रश्न पूछे जाते हैं राज्य-केंद्रित नगरों, नदियों, योजनाओं, व्यक्तित्वों और संस्थाओं से। लेकिन 'केवल मध्यप्रदेश पढ़ लिया तो GS हो गया' यह समझ गलत है; राष्ट्रीय ढाँचे के बिना राज्य के तथ्य अपना अर्थ खो देते हैं।

प्रश्नपत्र-2 सामान्य अभिरुचि परीक्षण का नाम सुनते ही बहुत से अभ्यर्थी इसे 'आसान क्वांट और रीज़निंग' समझ लेते हैं। पर यहाँ क्वांट और रीजनिंग की मानक परीक्षा जैसी यांत्रिक गणना नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की घटनाओं पर तर्क, संख्या-समझ, आँकड़ों की व्याख्या, निर्णय-क्षमता और भाषा-बोध रहता है। प्रश्नों का उद्देश्य आपके दिमाग की चाल देखना है, याददाश्त का भार नहीं। यही कारण है कि यहाँ रटे हुए तथ्य कम और समझे हुए ढाँचे अधिक काम आते हैं।

GAT की अर्हकारी प्रकृति को ठीक से समझें। अर्हकारी का अर्थ है कि इस प्रश्नपत्र में आपको आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम अंक लाना अनिवार्य है; पर जो अंक इससे अधिक मिलें, वे प्रारंभिक परीक्षा की मेरिट सूची में नहीं जोड़े जाते। मेरिट सूची प्रश्नपत्र-1 के अंकों के आधार पर बनती है। इसलिए प्रश्नपत्र-2 में दो अभ्यर्थियों के बीच अंकों का अंतर होते हुए भी मेरिट-क्रम वही रहता है, जब तक दोनों आयोग द्वारा तय न्यूनतम सीमा पार करते हैं। यही नियम अधिकांश राज्य सेवा परीक्षाओं का होता है, पर इस पर भी अधिसूचना के शब्दों की ही मान्यता होगी।

इसका यह अर्थ नहीं कि GAT की तैयारी नहीं करनी चाहिए। बहुत से अभ्यर्थी 'क्वालिफाई' शब्द सुनकर इसे रटने-योग्य विषय समझ लेते हैं और परीक्षा में प्रश्नों की भाषा में उलझ जाते हैं। अर्हकारी प्रश्नपत्र उन्हीं को आगे भेजता है जो न्यूनतम प्रतिशत पूरा करते हैं; इस न्यूनतम को पूरा करने के लिए भी सटीकता आवश्यक है। यदि प्रश्नपत्र में ऋणात्मक अंकन है, तो अर्हता की दहलीज पर अंधाधुंध अनुमान आपको नीचे भी खिसका सकता है। इसलिए GAT में भी सटीक सही-उत्तर चुनने का अभ्यास चाहिए, केवल 'हो जाएगा' का भरोसा नहीं।

न्यूनतम अर्हकारी प्रतिशत का आँकड़ा इस पुस्तक में जानबूझकर नहीं छापा गया है। MPPSC प्रत्येक अधिसूचना में यह तय करता है और वह सामान्य/आरक्षित श्रेणी के अनुसार भिन्न हो सकता है। पुरानी परीक्षा के अर्हकारी अंकों को आधार बनाकर यह नहीं सोचना चाहिए कि 'इतने अंक आएँगे ही'। आयोग इसे समय-समय पर बदलता रहा है। इसलिए जब भी कोई नई अधिसूचना आए, सबसे पहले उसकी परीक्षा-योजना तालिका में GAT के न्यूनतम अर्हकारी प्रतिशत को पढ़ें और उसे अपने अभ्यास के अंक-मानक से जोड़ें।

दोनों पत्रों के समय-बंटवारे में सबसे महत्वपूर्ण है दिमाग को दो अलग-अलग पालियों के लिए तैयार रखना। प्रचलित प्रारूप में प्रारंभिक परीक्षा एक ही दिन दो पालियों में होती है—प्रायः पहली पाली में सामान्य अध्ययन और दूसरी में GAT। सुबह के पेपर में याद करने की शक्ति, दोपहर/अपराह्न में गणना और तर्क पर ध्यान केंद्रित होता है। घर पर मॉक टेस्ट देते समय भी इसी क्रम का अनुकरण करें। अधिसूचना में दी गई अवधि के अनुसार प्रति-प्रश्न समय-बजट बनाएँ; GAT के गणना-आधारित प्रश्नों के लिए सामान्यतः अधिक समय रखें, क्योंकि वहाँ वाचन-समय कम और हल-समय अधिक लगता है।

प्रारंभिक परीक्षा की समग्र सफलता की कसौटी केवल GAT पार करना नहीं, बल्कि GS में कटऑफ से ऊपर अंक लाना है। इसलिए GS पढ़ते समय विषय-गहराई और GAT का अभ्यास करते समय गति-गहराई का अलग-अलग लक्ष्य रखें। कई अभ्यर्थी GS में तो गहराई से पढ़ते हैं, पर GAT को महज हल्का-फुल्का समझकर अभ्यास में पीछे छोड़ देते हैं। यह असंतुलन ही प्रारंभिक परीक्षा में असफलता का सबसे आम कारण है। दोनों पत्रों को समान पवित्रता से नहीं, समान अनुशासन से तैयार करना होता है।

मुख्य परीक्षा: वर्णनात्मक GS प्रश्नपत्र और भाग-विभाजन

मुख्य परीक्षा का अर्थ ही वर्णनात्मक मूल्यांकन है। प्रारंभिक परीक्षा जहाँ वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से एक स्क्रीनिंग का काम करती है, वहीं मुख्य परीक्षा के अंकों के आधार पर ही अंतिम योग्यता-सूची तैयार होती है। दूसरे शब्दों में, प्रारंभिक चरण आपको परीक्षा-हॉल तक पहुँचाता है, लेकिन चयन की आधारशिला मुख्य परीक्षा में लिखे गए उत्तर हैं। इसलिए जो अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा को 'पास करने का अभ्यास' मानकर पूरी तैयारी करते हैं, वे अक्सर मुख्य परीक्षा में उत्तर-लेखन के अनुशासन के अभाव में पिछड़ जाते हैं।

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्रों का ढाँचा परीक्षा-नक्शे में एक सुसंगत चित्र प्रस्तुत करता है: हर प्रश्नपत्र भाग-अ और भाग-ब में बँटा होता है। यह विभाजन केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह बताता है कि उस प्रश्नपत्र में अलग-अलग प्रकार के प्रश्न पूछे जा रहे हैं। भाग-अ में अक्सर अपेक्षाकृत कम अंकों वाले अधिक प्रश्न होते हैं, जबकि भाग-ब में अधिक अंकों वाले कम प्रश्न; पर यह शब्द 'अक्सर' आपको भरोसे पर नहीं चलने देता। आयोग की अधिसूचना प्रत्येक भाग के प्रश्न-संख्या, अनिवार्यता और अंक-विभाजन को स्पष्ट करती है।

उदाहरण के लिए, यदि अधिसूचना कहे कि भाग-अ में 6 प्रश्न अनिवार्य हैं और भाग-ब में 8 प्रश्नों में से 5 के उत्तर देने हैं, तो इसका अर्थ है कि भाग-अ की गणना शत-प्रतिशत होगी, जबकि भाग-ब में आपको चयन की स्वतंत्रता मिली है। अभ्यर्थी प्रायः भाग-ब में वही प्रश्न चुनते हैं जो पहले देखे हों, पर उपेक्षा करते हैं कि भाग-अ के अनिवार्य प्रश्नों का अंकभार अधिक हो सकता है। कोई भी रणनीति बनाने से पहले प्रश्नपत्र-वार अंक-वितरण को कागज़ पर लिखना ज़रूरी है।

प्रत्येक मुख्य प्रश्नपत्र की समय-सीमा भी अधिसूचना में निश्चित होती है। यदि तीन घंटे का प्रश्नपत्र 100 अंक का है तो प्रति अंक 1.8 मिनट से अधिक नहीं बैठता; 10 अंक के प्रश्न के लिए लगभग 18 मिनट की सीमा बनती है। पर यदि कोई प्रश्नपत्र 250 अंक का हो, तो यही गणना बदल जाती है। इसलिए पहले अंक और अवधि का अनुपात निकालें, फिर उस अनुपात को अपने अभ्यास के हर अभ्यास-पत्र पर लागू करें। घड़ी को प्रश्न के अनुसार नियंत्रित करने की आदत अभी बनाएँ, परीक्षा-हॉल में नहीं।

द्विभाषी पद्धति मुख्य परीक्षा में भी लागू होती है; प्रश्नपत्र का मुद्रण हिन्दी और English दोनों में होता है। यहाँ पारिभाषिक युग्मों की भूमिका और गहरी हो जाती है — प्रारंभिक में आपको सही विकल्प पहचानना होता है, मुख्य में आपको सही शब्द स्वयं लिखना होता है। उदाहरण के लिए 'न्यायिक पुनरावलोकन' शब्द देखकर पहचान लेना एक कौशल है, लेकिन उत्तर में सही संदर्भ के साथ Judicial Review की अवधारणा स्पष्ट करना दूसरा और बड़ा कौशल है। इसलिए शब्दावली को अभी से हिन्दी–English जोड़े में याद करना शुरू करें।

उत्तर-लेखन कौशल भाग-अ और भाग-ब का असली मूल्यांकन तय करता है। 'Explain', 'Discuss' और 'Critically examine' जैसे निर्देश-शब्द (instruction words) बताते हैं कि उत्तर में कितना विश्लेषण अपेक्षित है। मात्र तथ्यों की सूची से नहीं, बल्कि परिचय, मुख्य तर्क और संतुलित निष्कर्ष के साथ प्रश्न की माँग को पूरा करने वाला उत्तर अधिक अंक लाता है। भाग-अ के छोटे प्रश्नों में सटीकता, भाग-ब के बड़े प्रश्नों में विस्तार और संरचना की जाँच होती है।

इस अध्याय का पहला सूत्र यही है: मुख्य परीक्षा की तैयारी को प्रारंभिक के बाद शुरू न करें; आज से ही प्रत्येक विषय के नोट्स को उत्तर-लेखन की दृष्टि से बनाना शुरू करें। जब आप प्रारंभिक के लिए पढ़ रहे हों, तब भी उसी तथ्य को तीन वाक्यों में लिखकर संरचना का अभ्यास कीजिए। मुख्य परीक्षा का भाग-विभाजन अंततः इसी लेखन-कौशल की परीक्षा है।

आधिकारिक अधिसूचना का अधिकार और निर्देश-पृष्ठ का नियम

परीक्षा से जुड़ी हर संख्या का एक स्रोत है: आयोग द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना (Official Notification/Advertisement)। इसमें प्रश्न-संख्या, अंक, अवधि, अर्हकारी प्रतिशत, ऋणात्मक अंकन का अंश और पात्रता की शर्तें छपी होती हैं। कई अभ्यर्थी कोचिंग नोट्स या पिछले वर्ष के प्रश्नपत्रों को ही स्रोत मान लेते हैं, लेकिन जब आयोग पैटर्न में बदलाव करता है, तो वही पुरानी जानकारी उन्हें परीक्षा-कक्ष में भ्रमित करती है।

अधिसूचना का पूरा पाठ आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध होता है। पढ़ते समय 'Scheme of Examination' नामक भाग को सबसे सावधानी से देखें। प्रत्येक प्रश्नपत्र के लिए उसमें स्पष्ट रूप से लिखा होता है कि कितने प्रश्न पूछे जाएँगे, किस भाग में, कितने अंकों के और कितने समय में हल करने हैं। इसके साथ ही यह भी देखें कि कौन-सा प्रश्नपत्र अर्हकारी है और कौन-सा मेरिट में जुड़ता है। यह जानकारी किसी भी कोचिंग सामग्री से लेने की बजाय अधिसूचना से लेना सबसे सुरक्षित है।

निर्देश-पृष्ठ का नियम इस पुस्तक की सबसे व्यावहारिक सलाह है। जब आप परीक्षा-कक्ष में बैठकर प्रश्नपत्र खोलते हैं, तो सबसे पहले जो पृष्ठ सामने आता है, वही आपके उस पाली का अंतिम निर्देश-स्रोत है। यदि प्रश्न-संख्या, अंक, अवधि या ऋणात्मक अंकन के बारे में कोई बाहरी जानकारी भिन्न हो, तो उपेक्षा कर उसी पृष्ठ को मानें। परीक्षा-कक्ष में 'मुझे लगता है' पर नहीं, बल्कि 'यहाँ लिखा है' पर निर्णय करना चाहिए।

द्विभाषी प्रश्नपत्र में यदि हिन्दी और English के किसी निर्देश में विरोधाभास दिखे, तो अपनी समझ से उसे 'सही' करने का प्रयास न करें। पहले दोनों भाषाओं के कथनों को मिलाकर पढ़ें; प्रायः अंतर मुद्रण या अनुवाद की बारीकी का होता है। यदि फिर भी अस्पष्टता बनी रहे, तो निर्देश-पृष्ठ पर छपे मूल नियम को ही अंतिम मानें। अनुमान के आधार पर प्रश्न छोड़ना या हल करना, दोनों ही जोखिम भरे हैं, इसलिए निर्देश-पृष्ठ की भाषा बदलकर न पढ़ें।

Continues in the full eBook

  • अध्याय 1: परीक्षा का ढाँचा, द्विभाषी प्रश्नपत्र पद्धति और स्कोरिंग रणनीति
  • अध्याय 2: भारत एवं मध्यप्रदेश का इतिहास तथा प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा
  • अध्याय 3: मध्यप्रदेश की जनजातियाँ, लोक-संस्कृति, विरासत एवं पर्यटन
  • अध्याय 4: भारत एवं मध्यप्रदेश का भूगोल, पर्यावरण, आपदा और भू-स्थानिक तकनीक
  • अध्याय 5: भारत एवं मध्यप्रदेश की संवैधानिक व्यवस्था, शासन और लोक-प्रशासन
  • अध्याय 6: समाजशास्त्र, भारतीय समाज और सामाजिक कल्याण
  • अध्याय 7: भारत एवं मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था, कृषि, विकास और सांख्यिकी
  • अध्याय 8: सामान्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, लोक-स्वास्थ्य और आयुष
  • अध्याय 9: सूचना-संचार प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर विज्ञान और उभरती तकनीक
  • अध्याय 10: समसामयिक घटनाक्रम, योजनाएँ और लोक-नीति
  • अध्याय 11: दर्शन, मनोविज्ञान, नैतिकता, लोक-प्रशासन और केस स्टडी
  • अध्याय 12: उद्यमिता, प्रबंधन, व्यक्तित्व विकास और आपदा प्रबंधन

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Listed chapters and topics

1. History, culture and social change

Ancient, medieval and modern history · National movement · Madhya Pradesh history and culture · Post-independence developments

2. Indian and state polity

Constitution and governance · Union-state relations · Local government · Madhya Pradesh administration and public services

3. Geography and environment

Physical and human geography · Indian geography · Madhya Pradesh geography · Environment, biodiversity and disasters

4. Economy and development

Basic economic concepts · Indian economy · Madhya Pradesh economy and development · Budget, planning and inclusive growth

5. Science and technology

General science · Everyday applications · Health and life science · Technology and innovation

6. Current affairs and public policy

National and international events · Madhya Pradesh current affairs · Government programmes · Reports, indices and institutions

7. Madhya Pradesh integrated studies

Map and resources · Society and culture · Institutions and economy · Dated state update sheet

8. Aptitude and mental ability

Numeracy · Data interpretation · Problem solving · Decision-making

9. Reasoning and comprehension

Logical reasoning · Analytical ability · Comprehension · Communication

10. Mains answer writing

Directive analysis · Evidence use · Balanced evaluation · Essay and précis practice

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